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ऋषिकेश में गंगा तट पर सजी भक्ति और संस्कृति की अलौकिक छटा, सीएम धामी ने की भव्य गंगा आरती

तीर्थनगरी ऋषिकेश स्थित परमार्थ निकेतन में शुक्रवार शाम आध्यात्म, संस्कृति और श्रद्धा का अद्भुत संगम देखने को मिला। मां गंगा के पावन तट पर आयोजित भव्य गंगा आरती में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सहित अनेक संत-महात्माओं, जनप्रतिनिधियों और श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर देश और प्रदेश की सुख-समृद्धि की कामना की। आरती के दौरान पूरा वातावरण वैदिक मंत्रोच्चार, भजन-कीर्तन और गंगा मैया के जयघोष से भक्तिमय हो उठा।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं ने भी भाग लिया। गंगा तट पर दीपों की जगमगाहट और आध्यात्मिक वातावरण ने सभी को भावविभोर कर दिया। मुख्यमंत्री धामी ने मां गंगा की आरती कर प्रदेशवासियों की खुशहाली, शांति और समृद्धि की प्रार्थना की तथा सनातन संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

इस अवसर पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने कहा कि मां गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और सभ्यता की जीवनधारा हैं। उन्होंने कहा कि गंगा तट पर पहुंचकर हर व्यक्ति को आध्यात्मिक शांति और आत्मिक ऊर्जा का अनुभव होता है। भारत की सांस्कृतिक विरासत और संत परंपरा ने सदियों से समाज को दिशा देने का कार्य किया है और आज भी यह परंपरा समाज को जोड़ने का कार्य कर रही है।

उन्होंने कहा कि ऋषि-मुनियों और संतों की तपस्थली रही यह भूमि पूरे विश्व को मानवता, सेवा और आध्यात्म का संदेश देती रही है। भारतीय संस्कृति की यही विशेषता है कि वह सभी को साथ लेकर चलने और प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव सिखाती है।

कार्यक्रम के दौरान परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद मुनि महाराज ने गंगा संरक्षण, पर्यावरण संवर्धन और मानव सेवा के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मां गंगा का संरक्षण केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। स्वच्छ और निर्मल गंगा आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी सबसे बड़ी धरोहर है।

गंगा आरती में देश के विभिन्न अखाड़ों और धार्मिक संस्थाओं से जुड़े संत-महात्माओं ने भी सहभागिता की। इस दौरान संत समाज ने आध्यात्मिक मूल्यों, पर्यावरण संरक्षण और समाज सेवा को जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाने का संदेश दिया।

कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालुओं ने गंगा आरती को दिव्य और अविस्मरणीय अनुभव बताया। गंगा तट पर सजी यह आध्यात्मिक संध्या एक बार फिर ऋषिकेश की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को विश्व पटल पर स्थापित करती नजर आई।

भक्ति, संस्कृति और आध्यात्म के इस भव्य आयोजन ने यह संदेश भी दिया कि सनातन परंपराएं आज भी समाज को जोड़ने, प्रेरित करने और सकारात्मक दिशा देने की शक्ति रखती हैं।

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