
: उत्तराखंड में चिकित्सा क्षेत्र को आधुनिक तकनीक से जोड़ने की दिशा में एक नई पहल की तैयारी है। स्वास्थ्य सेवाओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की उपयोगिता को बढ़ाने के उद्देश्य से एचएनबी मेडिकल यूनिवर्सिटी एक विशेष डिजिटल हेल्थ कोर्स शुरू करने जा रही है। इस पाठ्यक्रम के माध्यम से कार्यरत डॉक्टरों को AI आधारित तकनीकों और उनके व्यावहारिक इस्तेमाल से परिचित कराया जाएगा।
विश्वविद्यालय की ओर से माना जा रहा है कि आने वाले समय में AI स्वास्थ्य क्षेत्र में चिकित्सकों के लिए एक महत्वपूर्ण सहायक तकनीक साबित हो सकती है। इसका इस्तेमाल मरीजों की बेहतर जांच, चिकित्सा संबंधी शोध और स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाने में मददगार हो सकता है। खासतौर पर उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य के दूरस्थ इलाकों में इसका उपयोग स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
चिकित्सा शिक्षा में लगातार हो रहा बदलाव
प्रो. दुग्गल ने कहा कि उत्तराखंड में मेडिकल एजुकेशन के क्षेत्र में लगातार विस्तार और सुधार देखने को मिल रहा है। राज्य के करीब 170 कॉलेजों से शिक्षा प्राप्त कर चुके डॉक्टर, नर्सिंग और पैरामेडिकल क्षेत्र के कर्मचारी अलग-अलग स्थानों पर स्वास्थ्य सेवाओं में योगदान दे रहे हैं।
उन्होंने AI को चिकित्सकों के लिए चुनौती के बजाय सहयोगी तकनीक के रूप में देखने की बात कही। उनके अनुसार, AI का उद्देश्य डॉक्टरों की जगह लेना नहीं, बल्कि उन्हें बेहतर निर्णय लेने और मरीजों तक प्रभावी स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने में सहायता करना है। इसका लाभ अनुसंधान के क्षेत्र में भी मिल सकता है, जहां बड़ी मात्रा में जानकारी का विश्लेषण तेजी से किया जा सकेगा।
पहाड़ों में डॉक्टरों की कमी अब भी बड़ी चुनौती
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता को लेकर भी चर्चा की गई। प्रो. दुग्गल के मुताबिक पहाड़ी इलाकों में चिकित्सा सुविधाओं को मजबूत करने के साथ-साथ डॉक्टरों के लिए बेहतर कार्य और पारिवारिक सुविधाएं उपलब्ध कराना जरूरी है।
विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी के पीछे बड़े शहरों की ओर पेशेवर आकर्षण और मेडिकल कॉलेजों में सीमित परास्नातक सीटों जैसे कारण भी बताए गए। यदि पर्वतीय क्षेत्रों में आवश्यक सुविधाएं विकसित की जाएं, तो वहां डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
मेडिकल प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता पर जोर
मेडिकल कॉलेजों में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर प्रवेश जैसे मामलों को रोकने के लिए प्रवेश प्रक्रिया में अतिरिक्त सत्यापन की जरूरत पर भी सुझाव सामने आया। इसके तहत प्रारंभिक प्रवेश के बाद दस्तावेजों और अभ्यर्थियों का पुलिस स्तर पर सत्यापन कराने की व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है।
NEET जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाओं में अनियमितताओं को रोकने के लिए परीक्षा केंद्रों पर निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता भी बताई गई।
मेडिकल छात्रों के मानसिक दबाव को कम करने की जरूरत
चिकित्सा शिक्षा के दौरान छात्रों पर बढ़ते शैक्षणिक और मानसिक दबाव को भी गंभीर विषय बताया गया। इस दिशा में वरिष्ठ चिकित्सकों और शिक्षकों को विद्यार्थियों के लिए मार्गदर्शक की भूमिका निभाने का सुझाव दिया गया।
इसके साथ ही छात्रों और उनके परिवारों के बीच नियमित संवाद बनाए रखने तथा पढ़ाई के अलावा खेल, सांस्कृतिक कार्यक्रम और अन्य गतिविधियों को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया। इससे विद्यार्थियों को पढ़ाई के दबाव से संतुलित तरीके से निपटने में मदद मिल सकती है।
स्थानीय भाषा में मेडिकल शिक्षा पर जोर
प्रो. दुग्गल ने चिकित्सा शिक्षा में मातृभाषा के इस्तेमाल की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनका कहना है कि यदि डॉक्टरों को स्थानीय भाषा में मरीजों से संवाद करने में आसानी हो, तो वे उनकी समस्याओं को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।
उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहां अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय भाषाओं और बोलियों का व्यापक इस्तेमाल होता है, मरीज और चिकित्सक के बीच बेहतर संवाद स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है।



