निर्जला एकादशी पर श्रद्धा का महासंगम, कठोर व्रत रख भक्तों ने मांगी सुख-समृद्धि और मोक्ष की कामना देहरादून। ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाने वाली निर्जला एकादशी सनातन परंपरा में विशेष महत्व रखती है। इसे वर्ष की सभी एकादशियों में सबसे कठिन और पुण्यदायी व्रत माना जाता है। गुरुवार को प्रदेशभर के मंदिरों और धार्मिक स्थलों में श्रद्धालुओं ने भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और आध्यात्मिक कल्याण की कामना की।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत रखने से वर्षभर की सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त होता है। यही कारण है कि इसे भीमसेनी या पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक कथाओं में वर्णित है कि महाभारत काल में भीमसेन ने महर्षि वेदव्यास के निर्देश पर इस विशेष व्रत का पालन किया था।इस व्रत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें अन्न के साथ-साथ जल का भी त्याग किया जाता है। श्रद्धालु सूर्योदय से लेकर अगले दिन पारण तक उपवास रखते हैं और भगवान विष्णु के मंत्रों का जप, भजन-कीर्तन तथा धार्मिक अनुष्ठानों में समय व्यतीत करते हैं। भीषण गर्मी के बीच यह व्रत संयम, धैर्य और आत्मनियंत्रण का प्रतीक माना जाता है।धार्मिक आचार्यों के अनुसार निर्जला एकादशी केवल उपवास का पर्व नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम भी है। यह दिन व्यक्ति को अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखने, सकारात्मक विचार अपनाने और ईश्वर भक्ति में लीन रहने की प्रेरणा देता है।इस अवसर पर भगवान विष्णु का विशेष पूजन, गंगाजल एवं पंचामृत से अभिषेक, तुलसी अर्पण और विष्णु मंत्रों का जाप किया जाता है। श्रद्धालु पीले वस्त्र धारण कर भगवान को फल, मिष्ठान और सात्विक भोग अर्पित करते हैं।निर्जला एकादशी पर दान-पुण्य का भी विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्यासे लोगों को जल पिलाना, जरूरतमंदों को अन्न दान करना और पशु-पक्षियों के लिए पानी की व्यवस्था करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। कई स्थानों पर श्रद्धालुओं द्वारा प्याऊ और जल सेवा शिविर भी लगाए गए।धार्मिक विद्वानों का कहना है कि यह पर्व समाज में सेवा, करुणा और परोपकार की भावना को मजबूत करता है। साथ ही व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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June 25, 2026
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